चन्दन लागवड की तक़नीक

चन्दन लागवड की तक़नीक

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डॉ. योगेश सुमठाणे, (M.Sc., Ph.D., M.B.A.), Mob. 8806217979

चन्दन काष्ठ (सैन्टलम अल्बम एल.) ऐतिहासिक तौर पर भारतीय संस्कृति एवं परम्परा के साथ जुड़ा हुआ है। वृक्ष कटान की हुई कुल्हाड़ी को भी सुगन्धता की महक पहुंचानेवाले चन्दन वृक्ष की कीमत बहुमौलिक है।

सैन्टलम प्रजाति से संबंधित यह (सैन्टलम अल्बम) वृक्ष अर्ध-परावलंबी/अर्धपरजीवी होता है जो अन्य प्रजाति के वृक्ष की जड़ों के जरिए रस चूस लेता है।

चन्दन का उल्लेख भारतीय साहित्य में दृष्टिगोचर होता है, जो इसका उल्लेख रामायण (क्रिस्त पूर्व 2000) तथा कालिदास साहित्य (क्रिस्त पूर्व 300). कौटिल्य के अर्थशास्त्र और वेद साहित्य में किया गया है।

चन्दन प्रायद्विपीय भारत देशज प्रजाति है। “सैन्डल’ शब्दचन्दना (संस्कृत) तथा चन्दन (पर्सिया) से उदभव हआ है। भारतीय भाषाओं में चन्दन के 15 नाम है जिसे हिन्दी में चन्दन, कन्नड में श्रीगंधा, तमिल में संदनम एवं तेलगु में चन्दनमु नाम से जाना जाता है।

चन्दन वृक्ष बहुमूल्य होता है तथा इसकी लकड़ी में सुगन्धता होती है । इसका मौलिक तेल व्यावसायिक क्षेत्र में ‘पूर्व भारत का चन्दन तेल’ से ख्यात है जो पुरातन सुगन्धित इत्रसाजी वस्तु में से एक है।

यह प्रजाति बहुपयोगी होने के परिणामस्वरूप इस महत्वपूर्ण प्रजाति को अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप एवं प्राकृतिक संसाधन संघ (आई.यु.सी.एन) द्वारा “असुरक्षित” प्रजाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

चन्दन वृक्षोपज की व्याप्ति एवं प्राकृतिक स्थान :

चन्दन वृक्षोपज की व्याप्ति पश्चिम में इंडोनेशिया के 30 एन एवं 40 एस के मध्य क्षेत्र से उत्तर के जुवान फनार्डिस द्वीप तक तथा दक्षिण के न्यूजिलैंड तक फैली हई है।

भारत में, सैटलम अल्बम की उपज व्याप्ति देश के सर्वत्र क्षेत्रों में फैली हुआ ह। कर्नाटक एवं तमिलाडु के लगभग 8300 वर्ग कि.मी. व्याप्ति में 90 प्रतिशत से अधिक चन्दन क्षेत्र है।

कर्नाटक में दक्षिण एवं पश्चिम क्षेत्र में लगभग 5000 वर्ग कि.मी. प्रदेश में चन्दन प्राकतिक रुप से उगता है । तमिलनाडु में 5000 वर्ग कि.मी. व्याप्ति में चन्दन पाया जाता है।

जिसमें उत्तर आर्काट (जवादि एवं एलगिरी घाट) एवं चित्तेरी घाटी प्रदेश में इसकी उपज अधिक घनिठ मात्रा में होती है ।

चन्दनोपज के अन्य राज्य आन्ध्र प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उडिसा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार एवं मणिपुर है।

समुद्रजल तेल से 1800 फीट ऊँचाई पर स्थित तरह तरह की मिट्टीयों में चन्दन उपज समद्ध होती है । रेतीली चिकनी मिट्टी, लाल मिट्टी, दानेदार मिट्टी तथा काही मिटटी भी चन्दन वृक्षोपज के लिए समृद्ध होती है ।

सूखी एवं 600 से 1600 मि.मी. वर्षा की शीत हवा चन्दनोपज के लिए उचित होती ह । अन्य प्रकार के वातावरण में भी चन्दन की अनकलक होती है ।

किन्तु अति जलयुक्त स्थल एवं शीत हवा में चन्दन की उप अनकलक नहीं होती है । प्रारंभिक दिनों में चन्दन आंशिक छाया में बहुत अच्छा उगता लेकिन उसके बाद अत्यन्त घनी छाया में बढ़ने में असमर्थता दर्शाता है।

रुपविधान एवं ऋतुजैविकी :

की दक्षिण पठार के सूखे एवं पतझड़ी वनों में अर्धजड परावलंबी सदाबहार वृक्ष चन्दन वृक्ष होता है । इस वृक्ष की ऊँचाई लगभग 12 से 15 मीटर तक होती है तथा तने का आकार लगभग 1 से 2.4 मीटर तक का होता है ।

चन्दन वृक्ष की टहिनियाँ सरल एवं नीचे की ओर झुकी हुई होती है। इसकी छाल रंग में लाल भूरी या काली भूरी होती है ।

वह छोटे पौधों में मुलायम होती है तथा परिपक्व पेडों में बहुत कड़ी होती है । इसके पत्ते उलटे एवं चतुष्क (डेक्युस्सेट) तथा कभी कभी चक्करदार (होर्ल्ड) दिखाई देते है।

इसके फूल प्रारंभ में पीले रंग के असुगंधित होते है किन्तु बाद में परिपक्व होने पर गहन बैंगनी दिखाई देते है।

चन्दन वृक्ष दो तीन वर्ष की शुरुआती आयु में बहुत जल्द ही पुष्प फूलना आरंभ करता है तथा इसके फल-फूलों का कालचक्र परिवर्तित होता रहता है।

सामान्य तौर पर पुष्प फूलने का कालचक्र मार्च से मई तक तथा सितंबर से दिसंबर तक वर्ष में दो बार होता है।

कभी कभी पुष्प उगने के प्रत्येक दो व्यापन होते है जिससे एक ही वृक्ष एक ही समय पर परिपक्व फल को पुष्प अभिक्रम के विकास की सभी स्थितियाँ दर्शाता है।

चन्दन का फल पूर्ण रुप से पकने पर सरस गुठलीदार एवं रंग में बैंगनी एवं एकल बीज होता है।

बीज संचयन, प्रवर्धन एवं संग्रहण

चन्दन के फल का आकार गुठलीदार अण्डाकार या यदा-कदा दोनों छोर शुण्डाकार जैसे दिखाई देते हैं ।

चन्दन का वर्ण परिपक्व होने पर हरे वर्ण से काले बैंगनी वर्ण में परिवर्तित होता है ।

ताजे बैंगनी वर्ण के चन्दन फल के बीज का संचयन वृक्ष या भूतल पर गिर जाने पर किया जाता है।

चन्दन फल के बीज का संचयन मार्च/अप्रैल और सितंबर/अक्तूबर में किया जाता है ।

दोनों मौसमों में संचयित की हुई बीजों की मात्रा समरुप होती है ।

किन्तु बीजों का अधिक मात्रा में संचयन सितंबर/अक्तूबर में करना संभव होता है ।

पानी में भगोये हुए चंन्दन फल के छिलके को अलग करने के लिए बीजों को अच्छी तरह से घिस लेना और घिसे हए बीजों को छाँव में सुखा कर कीटनाशक दवाईयों से उपचारित करना एवं उन्हें वायुरोधी डिब्बे में Variability in Sandal संग्रहित कर रखना ।

संग्रहित किये औसतन 6000 बीज एक किलो ग्राम वजन तक होते है । सूखे हुए बीज संग्रहित करने से पूर्व उन्हे कीटनाशक दवाईयों से अच्छी तरह उपचारित कर लेना आवश्यक होता है ।

आम तौर पर बोरीयों में बीज भरकर संग्रहित करने की प्रणाली सस्ती होती है।

किन्तु बोरियों में संग्राहत किये हुए बीज नम होकर खराब हो जाते है और उन पर कृन्तक का आक्रमण कर 8-9 महीनों के बाद वे अपनी वक्षोपज करने की क्षमता खो देते हैं।

वैकल्पिक तौर पर वायुरोधी पात्र जो कि पॉलिथीन बैग या टीन डिब्बों में संग्रहित किये हुए बीज अपनी वृक्षोपज ।

गडया टिब्बों में बीज छिद्ररोपण

के अन्य प्रजातियों के वृक्ष की विधि वन में सामान्य तौर पर बीज छिद्ररोपण करने के अन्य प्रजातियों के नाम चन्दन को भी अपनाई जाती है । किन्तु टिन या गड्ढे में चन्दन वृक्ष के साथ अन्य आ वृक्ष भी उगाये जाते है।

उगाहे हुए पौधों को जमीन पर बुआई

पौधे उगाहने के लिए 3 एम x 3एम अन्तर पर 50 सी.एम.3 माप के गहरे गड्ढे खोदलेना और उनमें लगभग 30 सी.एम. की ऊँचाई तथा 3-4 एमएम कालर डायमीटर के स्वस्थ चन्दन पौधे रोपित किये जा सकते हैं ।

वन के अन्य भिन्न पौध प्रजातियों को चन्दन की अतिशेय पौध प्रजाति के रुप में चुनकर लेना तथा इन दोनों भी पौध प्रजातियों को पंचवक्ष प्रतिमान में एक समय में एक ही गड्ढे में या प्रथक गडढे में रोपित किया जा सकता है।

यह रोपण प्रणाली अनेक वन क्षेत्र में सफल साबित हुई है। वन क्षेत्र में चन्दन पौधे रोपित करते समयनित्य आतिथेय रोपण चन्दन पौध की वृद्धि विकसित करते है ।

अन्यथा इसके पत्तों में धधले पीलेपन की वृद्धि होकर लगभग एक वर्ष में चन्दन पौधे मर जाते है ।

चन्दन के 150 आतिथ्य पौधे है जिनमें से कैसुरिना इक्विसेटिफोलिया, एकेसिया निलोटिका, पोगैं मिया पिन्नाटा, मलिया डूयूबिया, राइटिया टिंकटोरिया एवं कैस्सिया सैमिया उत्तम आतिथेय पौधे है।  

मृदा खुदाई कार्य संचालन

प्रति छ:माही में एक बार पौधे के 50 सी.मी. घेरे में गुडाई का काम करना उत्तम होता है।

इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए कि आतिथेय वक्ष चन्दन से अधिक विकसित नहा काट-छाँट कर नियंत्रित करना चाहिए ताकि चन्दन को अधिकतम रोशना।

सापत क्षेत्र का आग एवं पशुओं के नुकसान से बचाने की दिशा में पर्याप्त सुरक्षा का अधिकतम रोशनी मिल सके। पौध शा में पर्याप्त सुरक्षा उपायों का

उपयोग/ अन्त : काष्ठ

चन्दन काष्ठ का वर्णन कठोर, कडुआ, ज्वरहारी, शीतला, उल्हादक, साधारण तोग भारी तथा टिकाऊ के रुप में किया है ।

यह अन्तःकाष्ठ अतिसुगिधत एवं बहु उपयोगी होता है इसका रंग पीला या भूरा दिखता है और वह तेलयुक्त होता है ।

अन्तःकाष्ठ गाँठमुक्त होता है इसलिए बाहरी उपकरण के उपयोग से उत्कीर्ण कार्य सरल तौर पर किया जा सकता है।

उत्कीर्ण एवं मूर्तिकारी के कार्य के लिए अति चिकने एवं मुलायम वृक्षों में से चन्दन वृक्ष एक अति उत्तम वृक्ष है।

चन्दन काष्ठ का उपयोग ज्वेल केसस, कैबिनेट पेनल्स, चेस बोर्डस, पेन होल्डर्स, पेपर वेट, किन्इवस, पिक्चर फ्रेम्स, केसकेटस मूर्तियां आदि वस्तु बनाने के लिए किया जाता है।

उत्कीर्ण कार्य के कुछ महत्वपूर्ण केन्द्र है जोकि अंकोला, बेगलौर, होन्नवर, कुमटा, मैसूर, सागर, सोरब, सिर्सि, तलगुप्पा (कर्नाटक में), जयपुर, जोधपुर, पाली, मथोपुर (राजस्थान में), तिरुवांतपुरम (केरल में), तिरुपति (आध्र प्रदेश में), सूरत एवं तमिलनाडु एवं उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में जहाँ चन्दन काष्ठ का उत्कीर्ण कार्य किया जाता है ।

धार्मिक कार्य, वस्त्रों को सुगंधित करने तथा खुशबुदार अगरबत्तियाँ बनाने के लिए चन्दन काष्ठ के चूर्ण का भारी मात्रा में उपयोग किया जाता है।

चन्दन तेल

चन्दन के अन्तःकाठ का चूर्ण आसवन प्रणाली से भट्टे में उतरवाकर ‘पूर्व भारत का चन्दन काष्ठ तेल उत्पादित करते है जो मधुर, सुगन्ध, सुदीर्घ काल तक खुशबूदार होता है।

चन्दन काष्ठ तेल का उत्पादन सीधे तौर पर तने, मूलकंद या अन्तःकाष्ठ के आधार पर उत्पादित किया जाता है।

अच्छे विकसित वृक्ष से 18 से 6% चन्दन तेल उत्पादित किया जा सकता है ।

तेल किस हिस्से से निकाला गया है यह बहुमुख्य होता है ।

विविध सुगध वस्तु एव प्राच्य वस्तु उत्पादन में चन्दन तेल का प्रयोग अधिक मात्रा में किया जाता है ।

सर्वोत्तम स्तर की सुगन्ध महक चन्दन काष्ठ तेल से उत्पन्न होती है।

किन्तु स्वतंत्र रुप से चन्दन तेल ति सौम्य एवं मंदगति से लुप्त होता है।

फिर भी उद्योग क्षेत्र में देखा जाता है कि, यह तेल गाधत वस्तु में अच्छी तरह मिश्रित हो जाता है और इसके इस्तेमाल से इसकी महक पता नहीं चलती है।

चन्दन तेल को अगरबत्ती अंगराग, सुगंधित वस्तु एवं साबुन बनाने उद्योगों मे स्थायी स्थान प्राप्त है ।

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चन्दन तेल अच्छा सुगंधित तेल होने के साथ साथ कीटकनाशक ज्वरहारी, चर्मखुजली निवारक, मूत्रवर्धक अग्नि उत्तेजक, पुरानी खाँसी का निवारण कसे गोनोराहिया तथा मूत्र अभाव होने पर प्रयोग करना लाभदायक होता है ।

किन्तु बुनियाद तौर पर चन्दन तेल का अधिक मात्रा में प्रयोग सुगंधित वस्तु एवं औषध बनाने के लिए किया जाता है ।

डॉ. योगेश सुमठाणे, (M.Sc., Ph.D., M.B.A.), Agricultural Senior, Bamboo Research & Training Centre, Chandrapur (MS) Mob. 8806217979 

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