तीखुर औषधीया वनस्पती

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डॉ. योगेश सुमठाणे, Ph.D. FPU, BUAT, Banda, (UP) मो.नं. +91 88062 17979

तीखुर का वानस्पतिक नाम Curcuma angustifolia है। यह Zingiberaceae कुल का एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है। इसके विभिन्न भाषाओं में नाम जैसे – संस्कृत में टवाक्सिरा; हिन्दी में तीखुर, मराठी में टवाखीरा; तमिल में आरारोट किंजोगु; तेलग में आरारूट पद्दालु, पलागुल्ला; एवं अंग्रेजी में Indian Arorot के नाम से जाना जाता है।

हल्दी के पौधे के समान होता है तथा इसे सफेद हल्दी के नाम से भी जाना जाता है। इसके कंदों में कपूर के समान आने वाली गंध के कारण वन क्षेत्रों में इसे आसानी से पहचाना जा सकता है। इसकी कंदिल जड़ें। (राइजोम) से प्राप्त माण्ड (स्टार्च) में वास्तविक आरारोट (Martanta arundinaceae) का प्रयोग मिलावट के रूप में किया जाता है।

यह एक तना रहित कंदिल जड़ (राइजोम) वाला पौधा है। इसकी जड़ों में लम्बी मांसल रेशेनुमा संरचनायें निकलती है जिनके सिरों पर हल्के मटमैले रंग के कंद पाये जाते हैं। इसकी पत्तियाँ 30-40 से.मी. लम्बी, भालाकार तथा नुकीले शीर्ष वाली होती है। इसके पीले रंग के पुष्प गुलाबी सहपत्रों (Bract) से घिरे होते हैं। इसके पुष्प सहपत्रों से बड़े होते हैं।

तीखुर मध्य प्रान्त की मूल प्रजाति है जो पश्चिम बंगाल, मद्रास तथा निचले हिमालयी भागों में प्राकृतिक रूप से पायी जाती है। इसके अतिरिक्त यह प्रजाति मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के पूर्वी एवं दक्षिण-पूर्वी नम पर्णपाती साल व मिश्रित वनों में पायी जाती है। तीखुर के पौधों की पत्तियाँ अक्टूबर-नवम्बर माह में सूखने लगती है। इसी समय आदिवासी इन पौधों को अपने उपयोग के लिए खोदकर संग्रहित कर लेते हैं। अप्रैल-मई माह में वन क्षेत्रों में इन पौधों को पहचानना कठिन होता है, क्योंकि इनके ऊपर की पत्तियाँ सूख चुकी होती हैं।

औषधीय उपयोग :

तीखुर का कंद मधुर, पौष्टिक एवं रक्तशोधक होता है। तीखुर अधिक उम्र के व्यक्तियों एवं बच्चों में कमजोरी को दूर करने में काफी महत्वपूर्ण हैं। तीखुर का कंद ही इसका उपयोगी भाग है। इन्हीं कंदों के लिए वर्तमान में इसकी खेती भी की जाने लगी है।

तीखुर पाउडर में स्थार्च, जापान, सोडियम. विटामिन-ए एवं विटामिन-सी पाया जाता है। यह फलाहारी खाटय पदार्थ के रूप में उपयोग होता है। तीखुर से बनी खोवे की जलेबी मिठाइयाँ, शरबत आदि को भी फलाहार के रूप में लिया जाता है। इसके अतिरिक्त आईस्क्रीम या दूध में उबालकर भी इसका उपयोग किया जाता है। आयुर्वेदिक शक्तिवर्धक दवाओं में भी तीखर का उपयोग होता है। तीखुर कंद के अर्क का उपयोग रक्तशोधन, ज्वर । जलन, अपच, पीलिया, पथरी, अल्सर, कोढ़ एवं रक्त संबंधी बीमारियों को दूर करने में किया जाता है। तीखुर के कंदों से सुगंधित । तेल भी प्राप्त होता है जिसका उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है।

रासायनिक संगठन :

तीखुर पाउडर के तत्वों की रासायनिक संरचना में प्रति 100 ग्राम में संतृप्त फैटी ऐसिड-0.10 ग्राम, वसा-0.06 ग्राम, प्रोटीन- 0.01 ग्राम, कार्बोहाइड्रेड-82.00 ग्राम, फाइवर-14.00 ग्राम, सोडियम-0.02 मि.ग्रा., कैल्सियम-0.09 ग्राम, आयरन-13.00 मि.ग्रा., विटामिन ए-3407 आई यू, विटामिन सी-74.00 मि.ग्रा. पाया जाता है।

कृषि तकनीकभूमि व जलवायु :

तीखुर की खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी जिसमें जल निकास की उचित व्यवस्था हो, सबसे उपयुक्त होती है।

आंशिक छायादार या खुले स्थानों में कंदिल जड़ों का विकास सुगमता से होता है। इसके लिए 25°-35°C का तापमान उपयुक्त होता है। खेत की तैयारी- तीखुर की खेती के लिए चयनित खेत में, मई माह में कम से कम 2 बार हल द्वारा अच्छी जुताई कर लेनी चाहिए, जिससे भूमि में पाये जाने वाले जीवाश्म समाप्त हो जाय । तत्पश्चात् 10-15 टन गोबर की पकी हुई खाद खेत में प्रति हेक्टेयर के हिसाब से मिला देना चाहिए तथा पुन: जुताई कर देनी चाहिए।

रोपण विधि :

तीखुर की खेती के लिए तैयार खेत में सर्वप्रथम लगभग 30 से.मी. की दूरी पर नालियाँ बना लेना चाहिए।

के अंतिम सप्ताह या जुलाई माह के प्रारंभ में अंकुरित कंदों को जीवित कलिकायुक्त टुकड़ों में काट लेना चाहिए । इसके पश्चात् कंदों को नालियों के बीच चढ़ी हुई मिट्टी में रोपित कर देना चाहिए। पौधों को कतार में 20-30 से.मी. की दूरी पर लगाना चाहिए । कंदों को रोपित करते समय गड्ढों की गहराई लगभग 5-10 से.मी. से अधिक नहीं होनी चाहिए।

सिंचाई :

रोपण के पश्चात् तुरंत सिंचाई करनी चाहिए । मानसून में वर्षा न होने की स्थिति में सिंचाई करनी चाहिए । यदि आवश्यक हो तो वर्षा ऋतु के उपरान्त भी सिंचाई करनी चाहिए।

निदाई-गुड़ाई :

बरसात समाप्त होने के पश्चात 20-25 दिनों के अंतराल पर निदाई-गुड़ाई करके खरपतवार निकाल देना चाहिए तथा कंदों पर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए, जिससे कंदों की वृद्धि सुचारू रूप से हो सके।

रोग व रोकथाम :

सामान्यतः तीखुर की फसल पर किसी प्रकार के रोग व कीटों का प्रकोप नहीं होता है। परन्तु कभी-कभी पत्तियाँ पीली हो जाती हैं तथा उनपर काले-काले धब्बे भी दिखाई देने लगते हैं। इसके रोकथाम हेतु उपयुक्त कीटनाशक मोनोक्रोटोफास का उपयोग करना उचित होता है।

कटाई व संग्रहण :

तीखुर की फसल 7-8 माह में परिपक्व होकर तैयार हो जाती है। फरवरी-मार्च माह में जिस समय पौधे की सम्पूर्ण पत्तियां सूख जाय तब कंदों को भूमि से निकाल लेते हैं। प्रमुख मूल कंदों से छोटे-छोटे अंगुली (Finger) के आकार वाले कंदों को अलग कर लिया जाता है।

फिंगर कंदों को पानी से साफ धोकर अलग कर लिया जाता है एवं छायादार स्थानों पर सुखा लिया जाता है। साथ ही प्रमुख कंदों को बीजों के रूप में रोपण के लिए सरक्षित कर लिया जाता है। कुछ कृषक तीखुर के मूल कंदों को उसी खेत में गड्ढों में लगा देते हैं।

जिससे वे अगले वर्ष भी इन्हीं कंदों से खेती करते हैं। विनाश विहीन विदोहन पद्धति से मात्र 80 प्रतिशत ही तीखर के कंदों का दोहन किया जाता है। छोटे कंदों को पुनरूत्पादन हेतु वहीं भूमि में दबा दिया जाता है।

प्रसंस्करण :

तीखुर से स्टार्च प्राप्त करने के लिए कंदों का दो। विधियों द्वारा प्रसंस्करण किया जाता है। पारंपरिक विधि- आदिवासी भाई तीखुर प्रसंस्करण के लिए एक पुरानी पारंपरिक विधि उपयोग में लाते हैं।

इस विधि में कंदों को पानी से धोकर साफ पत्थर पर धीरे-धीरे घिसा जाता है जिससे गाढा द्रव निकलता है जिससे स्टार्च बनता है। इस द्रव को दो-तीन बार पानी में निथारने से घिसाई के दौरान आई अशुद्धियाँ व रेशे दूर हो जाते हैं।

इसके कंदों को मोटे गूदे (पल्प) के रूप में तैयार कर लिया जाता है। इस पल्प या गूदे को बारीक कपड़े से छाना जाता है और साथ-साथ पानी मिलाकर छानने से पूरा स्टार्च सही रूप में मिलता है।

तत्पश्चात इसे धूप में सुखा लिया जाता है जिसके कठोर हो जाने पर इसे पीसकर आटे के रूप में प्रयुक्त करते हैं। इसी विधि को व्यावसायिक स्तर पर उपयोग किया जाता है। इसके आटे में नासपाती के आकार के कण होते हैं तथा यह सुपाच्य होता है।

आधुनिक विधि- तीखुर कंदों को छीलकर इसे पानी से धो लिया जाता है। धोने के बाद तेज चाकू से इसके छोटे-छोटे टुकड़े काट लिए जाते हैं। तीखुर ग्राइंडिंग मशीन में पानी के साथ कटे टुकड़ों को डालकर उसकी लुग्दी (पल्प) तैयार कर ली जाती है।

तीखुर के कंदों की पिसाई की दर मशीन की क्षमता पर निर्भर करती है। सामान्यतः एक मशीन प्रतिघंटे लगभग 30-40 कि.ग्रा. कंदों की पिसाई कर लेती है।

पीसी हुई लुग्दी को सफेद सूती कपड़े में बांधकर ठंडा पानी प्रवाहित साफ मटकों में दबाया जाता है। इस क्रिया से तीखर के सफेद स्टार्च मटके में आ जाता है।

तत्पश्चात इसे जमने के लिए छोड़ दिया जाता है। जमे हए तीखुर को हर 24 घण्टे में एक बार पूरी तरह हिलाकर ठण्डे पानी से धोया जाता है ताकि अशुद्धियाँ निकल जाय । इस प्रकार 6 दिनों तक प्रतिदिन धोकर उसे निथारा जाता है।

इस प्रक्रिया से तीखुर का रंग पूरी तरह सफेद हो जाता है। सातवें दिन तीखुर को स्टील की ट्रे में रखकर पा लिया जाता है। जिससे तीखुर के सूखे बड़े-बडे क्रिस्टल प्राप्त होते हैं। तीखुर के इन सूखे क्रिस्टलों को पेकिंग के पश्चात् विक्रय हेतु तैयार कर लिया जाता है।

सामान्य परिस्थिति में 10 कि.ग्रा. कच्चे कंद से 1 कि.ग्रा. तीखुर प्राप्त होता है। तीखुर के साथ तीखुर जैसी बनावट का गेजीकंद भी आ जाता है, उसे पहचानना कठिन होता है। इसलिए एक कि.ग्रा. तीखुर पाउडर प्राप्त करने में लगभग 15 कि.ग्रा. तीखुर कंद लग जाता है।

उत्पादन व उपज :

तीखुर की सफल खेती से कृषक लगभग 30 से 40 क्विंटल प्रकंद प्रति हेक्टेयर की दर से प्राप्त करता है। जिसमें मूल कंद एवं फिंगर कंद दोनों ही शामिल होते हैं।

बाजार मूल्य :

तीखुर की खेती से लगभग 30-40 क्विंटल कंद प्रति हेक्टेयर प्राप्त होते हैं जिनका बाजार मूल्य रू. 25-30 प्रति किलो तक होता है। इस प्रकार प्रति हेक्टेयर कृषक तीखुर की खेती से लगभग रू. 1,20,000/- के कंद बाजार में बेचकर लगभग रू. 80,900/- लाभ प्रति हेक्टयेर अर्जित कर सकता है। फिंगर कंद एवं मूल कंद दोनों ही प्राप्त होते हैं।

डॉ. योगेश सुमठाणे, Ph.D. FPU, BUAT, Banda, (UP) मो.नं. +91 88062 17979

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