काष्ठ संशोषण (Wood Seasoning)

Wood Seasoning

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डॉ. योगेश सुमठाणे, (Scientist Forest Products and Utilization BUAT, Banda)

नूतनत: कटी या गिरी हुई लकड़ियों के भीतर नमी की मात्रा बहुत अधिक होती है। बहुतांश मामलों में अति सूखी हुई लकड़ी की तुलना में गीली लकड़ी के भीतर १००% से अधिक नमी पाई जा सकती है।

काष्ठ संशोषण लकड़ी को सुखाने की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसके जरिए आसपास के वायुमंडलीय स्थिति के आधार पर गीली लकड़ी की नमी को सनिश्चित मात्रा तक सुखाया जाता है। काष्ठ संशोषण का प्राथमिक उद्देश्य लकड़ी के गुणधर्म को बढाना एवं उसके किसी भी गुणता-लोप की न्युनता पर रोक लगाना है जिससे लकड़ी की मौलिक संपत्ति बरकरार बनी रहे।

काष्ठ संशोषण कार्य के मुख्य लाभकारी परिणाम निम्नप्रकार हैं:

  1. जिन लकड़ियों में नमी की मात्रा २०% से कम होती है, उस पर धब्बे पडने, सड़ जाने या उस पर फंगल कर्मण्यता से फ़फूंदी आक्रमण विकसित होने जैसे जोखिम नहीं होते हैं।
  2. सुखायी हुई लकड़ी गीले लकड़ी की तुलना में विशिष्ट रूप से दोगुना अधिक
  3. मजबूत होती है। सूखी हुई लकड़ी कील एवं पेंच (नेल एण्ड स्कू) को कसने पर मजबूती से पकड़ती है।
  4. काष्ठ परिरक्षणात्मक में रासायनिक उपचार किए जाने वाली लकडी को उपचारित रसायनों के त्वरित व्यापन होने हेतु उचित ढंग से सुखाया जाना आवश्यक है।
  5. सुखायी हुई लकड़ी विद्युत एवं उष्मीय पृथक्करण भूस्थावर पर बेहतर प्रदर्शित होती है।
  6. सूखी हुई लकड़ी हल्की होती है तथा उस पर आसानी से सुतारी एवं कारीगरी का कार्य किया जा सकता है।
  7. सूखी हुई लकड़ी पर सरेस भी आसानी से एवं प्रभावपूर्ण रूप से कार्य करता है।

शष्कित लकड़ी के लिए मुख्य गुणता घटक सटीक नमी मात्रा है। शुष्कण के दौरान यह आवश्यक है कि, लकड़ी के पृथक हिस्सों में औसतन नमी मात्रा समान हो, लकड़ी के अंतर्भाग में खराबी नहीं हो, लकड़ी का अन्त हिस्सा खराब न हो, लकडी के किसी हिस्से में विकृति नहीं हो, (कप, बो, बाजू हिस्सा वक्र (क्रक), मरोडा हुआ), लकड़ी का तलकठोरीकरण नहीं हो, लकड़ी अच्छी रंगयुक्त, मजबूत, अल्प फंगल या रासायनिक बेदाग, अच्छे यंत्रयोग्य एवं चिपकने योग्य बनी रहे।

अनुचित नमी मात्रा का स्तर (Appropriate Moisture levels) :

कड़ी के उत्पादों को बनाते समय विभिन्न समस्याओं मुख्यतःआकार विकति. कड़ी की सतह पर एवं दोनों छोरों पर चिरान आदि से बचने के लिए लकड़ी को क सटीक स्तर की नमी मात्रा तक सुखाना आवश्यक है।

संशोषित लकड़ी की इष्टतम नमी मात्रा पहचानने की दृष्टि से भारत वर्ष को औसतन वार्षिक आपेक्षित आद्रता के अनुसार चार विशिष्ठ क्षेत्रों में विभाजित किया गया है। विभाजित क्षेत्रों में लकड़ी की उत्पादों में वांछनीय नमी की मात्रा निम्नानुसार दर्शायी गयी है।

तालिका 1

भारत वर्ष के विभिन्न क्षेत्रों में लकड़ी उत्पादों में वांछनीय नमी मात्रा

उपयोगक्षेत्र-1 सपेक्ष नमी (आर.एच.<40%)क्षेत्र-2 सपेक्ष नमी (आर.एच.<40-50%)क्षेत्र-3 सपेक्ष नमी (आर.एच.<60-67%)क्षेत्र-4 सपेक्ष नमी (आर.एच.<67%)
वायूयान Aircraft12121415
कृषि-उपकरण12141616
कृत्रिम अंग (लिम्बस)8101212
युद्दोपकरण डिब्बे12121416
मोटरयान काया 50 एम एम से अधिक मोटाई10121416
50 एम एम से कम मोटाई8101214
फर्नीचर एवं कैबिन निर्मान10121415
शटल्स एवं बॉब्बीन्स8101212
खेल-कूद सामाग्री10121416
जहाज़ एवं नौका निर्माण12141618
मूठें/हण्डल्स्12121415
खिलौने, उत्कीर्ण सामग्री पेसिल्स8101212

Classification of Indian Timbers for Seasoning Purpose

संशोषण प्रयोजन हेतु लकड़ियों को उसके व्यवहारिकता के आधार पर शुष्कन अवक्रमण तथा शुष्कन अनुपात तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है।

i) वर्ग- अ (अत्यंत दुर्गलनीय लकड़ियाँ); ये धीरे शुष्कित होने वाली लकड़ियाँ हैं तथा इनको बिना किसी दरक एवं चीरन के संशोषित करना कठिन होता है। इसमें साल (सोरिया रुबुस्टा), लारेल( टर्मिनालिया एलाटा), एक्सले वूड (एनोजेइस्सस लेटिफ़ोलिया) चंद भारी संरचनात्मक लकड़ियाँ कुछ उदाहरण हैं।

ii) वर्ग-ब (संयमीत दुर्गलनीय लकड़ियाँ); इन वर्ग के लकड़ियों में संशोषण प्रक्रिया के दौरान दरक एवं चीरन होने की मध्यम संभावनाएं होती हैं। इस समूह की लकड़ियों को वर्ग-अ की तुलना में आसानी से सुखाया जा सकता है। फ़र्नीचर लकड़ियाँ जैसे सिस्सू (डल्बर्जिया सिस्सू) एवं सागौन (टेक्टोना ग्रेडिंस) इसके उदाहरण हैं।

iii) वर्ग-क (अदुर्गलनीय लकड़ियाँ); ये लकड़ियाँ दोषमुक्त शीघ्रतिशीघ्र सूख जाती हैं। अगर इन्हें शीघ्रता से नहीं सुखाया जाता है, तो इनकी सतह (सर्फेस) पर धब्बे एंव फंफूद लगने की संभावना होती है। पैकिंग बक्से की लकड़ियाँ जो सेमुल (बॉम्बैकस सिइबा), आम (मैंगजिफेरिया इंडिका), रबर लकड़ी (हेविया ब्रासिलए न्सिस), सलाइ (बासवेल्लिया सेर्राटा) इसके कुछ उदहारण हैं।

लकड़ियों की गर्मी (Stacking) :

लगभग सभी शुष्कन प्रक्रियाओं में (चंद अति विशिष्ट प्राक्रियाएं जैसे निर्वात शुष्कन प्रक्रिया को छोड़ कर), लकड़ियों के फट्टों को समस्तर परतो में सुखी हई मजबूत लकड़ी के छड़ियों पर जमाया जाता है।

इन छड़ियों को स्टिकर या संलागी कहा जाता है। समान्यत: इन छड़ियों को चौड़ाई एंव ऊंचाई 19-20 मिमी तथा लम्बाई लकड़ियों की गर्मी की चौड़ाई के बराबर होती है एंव दो क्रमतः सलागियों के बीच की दूरी 60-75 सेमी रखी जाती है।

यह अत्यन्त आवश्यक है कि एक गर्मी में सभी संलागीयों के माप बिल्कुल एक समान होना चाहिए। शुष्कन के दौरान लकड़ियों को इस तरह से जमाने का मुख्य उद्देश्य गरी में एक रुप वायु संचालन है। जिससे लकड़ियों का सटीक शुष्कन हो तथा उनमे शुष्कन के दौरान उत्पन्न होनेवाली विकृतियों को कम से कम या विलुप्त किया जा सके।

संशोषण प्रणालियाँ

वायू शुष्कन प्रणाली (Air drying) :

वायू शकन यार्ड में रखने के पश्चात लकड़ियों के सूखने की गति लकडियो के गणधर्म, लकड़ी में नमी की मात्रा, यार्ड एंव जलवायु स्थिति पर निर्भर करती है। वाय शकन प्रक्रिया सामान्यतया एक धीमी प्राक्रिया है।

लकड़ी के सखने के लिए लगने वाला वास्तविक समय लकड़ी के प्रकार, आकार, प्रजाति एंव जलवायू में होने वाले परिवर्तन पर निर्भर करता है। सामान्यतया वायु शुष्कन में लकडियों को छह माह तक रखा जाता है ।

एक इंच जाड़ी एंव ठोस लकडी को क संयत जलवायु में संशोषित या सूखने के लिए 3 से 4 महिने का समय लग सकता है। दरवाजों एंव खिड़कियों के ढाचों के लिए उपयोग में आने वाली लकड़ियों को, जो कि 3-4 इन्च मोटी होती है, 6 से 12 महिने तक का समय सामान्य वायु शुष्कन में लग सकता है।

बलकृत-वायु शुष्कन (Forced -Air drying) :

बिना अवक्रमण के लकड़ियों को तेजगति से सुखाने के लिए शेड में अतिरिक्त वायु शुष्कन पंखे लगाकर सुखाना शुष्कन गुणता को सुधारने के लिए प्रभावकारी साबित हुई है। पंखें प्रचालित करने के लिए विद्युत की लागत तेज शुष्कन लाभ के बराबर होती है । इसलिए, बलकत-वायु शुष्कन प्रणाली लकड़ी को हरी-भरी अवस्था से लगभग 20% नमी मात्रा तक सुखाने के लिए प्रभावकारी होती है। प्रभावी शुष्कन के लिए यह अवश्यक है कि वाय के दिशा प्रवाह एक निश्चित समय के बाद उलट दिया जाना चाहिए।

भट्टा शुष्कन प्रणाली (Kiln drying) :

भट्टा शुष्कन कार्य एक बंद कमरे या भवन में किया जाता है, जहाँ उष्ण, नमी नियात्रत हवा शष्कित किये जाने वाली लकडी की सतह पर तेज गति से संचालित ना है। शुरुवाति शुष्कन के लिए, औपचारिक रूप से आम तौर पर चापमान 38 सीसे 68 सी तक एवं वाय का वेग सामान्यतया 0.6 एवं 1.5 मी/से के बीच का होता है। लकड़ियों को उष्मसह या दुष्कर सखाने के लिए निम्नतर वेग की उपयोगिता होती है। भट्टे में लकड़ी को सुखाने की प्रक्रिया में उच्चतर वायु तापमान एंव तेज वायु-वेग वायु-शुष्कन तथा बलकृत वायु शुष्कन के अनुपात की तुलना में अति मुख्य हैं । भट्टा शुष्कन कार्य के दौरान लकड़ियों को सिकुडन दोष से बचाने तथा उनकी साम्यावस्था बनाये रखने के लिए उनमें आपेक्षित आर्द्रता (आरएच) या समत्व में नमी मात्रा (ईएमसी) को नियंत्रित बनाये रखना आवश्यक होता है। भट्टे में तापमान तथा आपेक्षिक आर्द्रता को तापमान अभिलेखक-नियंत्रक से नियंत्रक किया जाता है।

वाष्प उष्णतायुक्त भट्टे (Steam headted kilns):

इस प्रकार के भट्टे में, लकड़ियों को गरम करने तथा चेम्बर के भीतर सापेक्ष नमी बनाये रखने के उद्येश्य से वाष्प का ऊर्जा साधन के रूप में उपयोग किया जाता है।

वैद्युतिक उष्णतायुक्त भट्टे (Electrically heated kilns):

इस प्रकार के भट्टे में, लकड़ियों को गरम करने के उद्येश्य से विद्युत का ऊर्जा साधन के रूप में उपयोग किया जाता है। किन्तु सापेक्ष नमी के वांछित स्तर को प्राप्त करने निवार्हित उष्पता या ह्युमिडिफाइर की भी आवश्यकता होती है।

गैर नमीनिकरण शुष्कन कार्य (Dehumidification drying):

यह प्रणाली बहुत भारी गुणता की सामग्री शुष्कित करने की एक आकर्षक एंव प्रभावी प्रणाली है। इस प्रक्रिया में नमी युक्त वायु से नमी को दूर किया जाता है एंव सखी हई हवा को पुन: लकड़ियो की गर्मी से प्रवाहित किया जाता है। इसके सिवा, इस शुष्कन प्रक्रिया का समय वाष्प भट्टे के समय से अलग होता है । गैर नमीनिकरण भट्टा शुष्कन प्रणाली शुष्कन क्रिया वर्ग अ एंव ब के समूह की लकड़ियों को दोषमुक्त रूप से सुखाने के लिए कम खर्चिली एंव प्रभावकारी प्रणाली के रूप में साबित हुई है।

सौर भट्टा (Solar kiln) :

वायु संशोषण की तुलना में सौर भट्टे से लकड़ियों का शुष्कन त्वरित किया जा सकता है और अभिसामयिक वाष्प उष्पातायुकत भट्टे की तुलना में सौर संशोषण भट्टे का प्रयोग कर संशोषण लागत को कम किया जा सकता है।

भटटे की योजना (Kiln Schedules) :

भटटा संशोषण क्रिया के लिए संशोषित की जाने वाली लकड़ियों के आपण का तापमान तथा वायु की सापेक्ष मात्र नियंत्रित करने युक्त प्रौद्योगिकी अपनाई गयी है। इसलिए, लकड़ियों के संतुष्टजन एंव कार्यक्षम शुष्कन के लिए तापमान तथा नमी मात्रा का एक अनुकूलतम वातावरण भट्टे में बनाये रखना ज़रूरी होता है। इन बनाये हुए अनुकूलतम वातावरण स्थितियों को “भट्टा योजना” कहा जाता है । भारतीय स्थितियों में शुष्कन योजनाएँ नमी मात्रा पर आधारित हैं । औपचारिक भट्टा शुष्कन के लिए IS 1141-1993 द्वारा | से VII तक सात योजनाएँ संस्तुतित की गयी है।

शुष्कन दोष (Drying defects) :

सशक्त शुष्कन स्थितियाँ अनुचित गरौं, लकड़ियों के दुर्गलनीय रूप, अनियमित या असदृश ग्रेन एवं गुणधर्म या असाधारण वृद्वि से लकड़ियों में शुष्कन दोष विकसित होते हैं । शुष्कन अवनति रोकने तथा नियंत्रित करने के लिए शुष्कन प्रक्रिया के चार चरण तथा लकड़ियो के नमूनों के उपयोग को पूर्ण रूप से समझना अवश्यक है।

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लकड़ियों में सामान्यतया पाये जाने वाले दोषों को एक नीचे तालिका में दिया गया है:

कारणदोष
अतिशीघ्र शुष्कनदोष लकड़ी का सतह पर, छोरों पर एंव अन्तरिक रूप से चटकना एंव दरार पड़ना
अतिधीमी गति से शुष्कनफफूंद के धब्बे, आकार विकृति, रासायनिक दाग
अनुचित गरीआकार विकृति, असमान शुष्कन
प्रचालन त्रुटियाँसूखी लकड़ी में नमी की मात्रा में असमानता
विविध दोषसूखी एंव ढीली गांठ
संसाधन दोषउभरे हुए ग्रेन, दुर्गन्ध, लकड़ी को चिपकाने की समस्या आदि

डॉ. योगेश सुमठाणे, (Scientist Forest Products and Utilization BUAT, Banda)

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